सोमवार, 10 नवंबर 2014

एक जानिब शम्मे-महफ़िल - रफ़ी मन्ना डे

गाना - एक जानिब शम्मे-महफ़िल
फ़िल्म - अभिलाषा (1968)
गीतकार - मज़रूह सुल्तानपुरी
संगीतकार - राहुल देव बर्मन
गायककार - रफ़ी- मन्ना डे़

रफ़ी
आ आ आ ...एक जानिब शम्मे-महफ़िल
एक जानिब शम्मे-महफ़िल
एक जानिब रूहे-जाना
गिरता है देखें कहाँ परवाना
एक जानिब शम्मे-महफ़िल...

मन्ना डे-
एक जानिब शम्मे-महफ़िल
एक जानिब रूहे-जाना
ओ ओ गिरता है देखें कहाँ परवाना
एक जानिब शम्मे-महफ़िल....

रफ़ी-
एक सू एक शोला चरागों की अंजुमन में
एक सू रंगे-जलवा किसी बुत के बांकपन में

मन्ना ड़े-
एक शोला एक जलवा और इनमें एक दीवाना

एक जानिब शम्मे-महफ़िल
एक जानिब रूहे-जाना
ओ ओ गिरता है देखें कहाँ परवाना
एक जानिब शम्मे-महफ़िल

मन्ना ड़े-
उसकी क्या है मंजिल नहीं इतना बेखबर भी
आया दिलबरों में तो हैं काफी एक नज़र भी

रफ़ी-
इन नज़रों को यारों क्या जानूँ मैं अंजाना
एक जानिब शम्मे-महफ़िल
एक जानिब रूहे-जाना
ओ:ओ: गिरता है देखें कहाँ परवाना
एक जानिब शम्मे-महफ़िल

मन्ना डे - रफ़ी
ऊँ ऊँ ऊँ.....आ: आ: आ: ....ला: ला: ला:....
रफ़ी-
क्या-क्या रंग निकले हसीनों की सादगी से
ओ ओ ओ.....
मन्ना डे
इतनी है शिकायत के मिलते हैं अज़नबी से

रफ़ी-
जो ऐसा बेपरवाह क्या उससे दिल उलझाना
एक जानिब शम्मे-महफ़िल

मन्ना डे-
ओ: ओ:....
एक जानिब रूहे-जाना

रफ़ी - मन्ना डे
ओ  ओ ओ ....
गिरता है देखें कहाँ परवाना

एक जानिब शम्मे-महफ़िल
एक जानिब रूहे-जाना
ओ: ओ: गिरता है देखें कहाँ परवाना

एक जानिब शम्मे-महफ़िल

रविवार, 9 नवंबर 2014

गुलज़ार / अख़बार

अख़बार के तीसरे पन्ने पर ...हर रोज जब देखता हूं ..!
मरने वालो की तस्वीरें ....  कुछ देर मैं ढूँढता रहता
हू ..मेरी भी तस्वीर है ..क्या.?
बेसूहा हूं .. अब .. एहसास नही होता ...  की साँस आती है, जाती है, चलती भी है,... के... नही,..~~
अख़बार के पहले पन्ने पर ... बस अदाद ही गिनता हूं,..!गिनती ही देखता हूं, ... आज के दिन फिर कितने मरे, ... आज का स्कोर क्या है, ... बेसूहा हूं, .. एहसास नही होता .. की साँस चलती भी है ... की .. नही ..!

बुधवार, 5 नवंबर 2014

गुलज़ार

(1)
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम – गुलज़ार

ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम .!
बहुत जी चाहता है .. फिर से बो दूँ अपनी आंखें
तुम्हारे ढेर सारे चेहरे उगाऊं ,, और बुलाऊँ बारिशों को
बहुत जी है कि फुर्सत हो ... तसब्बुर हो ..!
तसब्बुर में थोड़ी बागवानी हो..!!

मगर जानां....
इक ऐसी उम्र में आकर मिली हो तुम
किसी के हिस्से कि मिटटी नहीं हिलती
किसी के धूप का हिस्सा नहीं छनता
मगर क्या क्यारी के पौधे पास अपने
अब किसी को पाँव रखने के लिए भी थाह नहीं देते
ये कैसी उम्र में आकर मिली हो तुम?

(2)
साँस लेना भी ..

साँस लेना भी .. कैसी आदत है ..
जीये जाना भी .. क्या रवायत है ..
कोई आहट नहीं बदन में कहीं..!
कोई साया नहीं है .. आँखों में,
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं ..
इक सफ़र है .. जो बहता रहता है ..
कितने बरसों से, कितनी सदियों से ..
जिये जाते हैं.. जिये जाते हैं ..!!

आदतें भी अजीब होती हैं...

(3)
सितारे लटके हुए हैं .. तागों से आस्माँ पर
चमकती चिंगारियाँ-सी चकरा रहीं आँखों की पुतलियों में,,
नज़र पे चिपके हुए हैं .. कुछ चिकने-चिकने से रोशनी के धब्बे
जो पलकें मुँदूँ तो चुभने लगती हैं .., रोशनी की सफ़ेद किरचें..!

मुझे मेरे मखमली अंधेरों की गोद में डाल दो .. उठाकर
चटकती आँखों पे घुप अंधेरों के फाये रख दो ..
यह रोशनी का उबलता लावा न अन्धा कर दे।
(4)
तुम गये तो और कुछ नही हुआ…

तुम गये तो और कुछ नही हुआ
दिल पे ऐत्बार घट गया मेरा
में जो दिल के पीछे उसके नक्शे पाअ के पांव रखके चलता था
चलते चलते देखा तो निशान खत्म हो गये

तुम गये तो और कुछ नही हुआ
दिल पे ऐत्बार घट गया मेरा !!
(6)

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

(7)

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ आ कर

मैं अपने घर में ही अजनबी हो गया हूँ .. आ कर
मुझे यहाँ देखकर .. मेरी रूह डर गई है..,
सहम के सब आरज़ुएँ कोनों में जा छुपी हैं
लवें बुझा दी हैं .., अपने चेहरों की ,, हसरतों ने
कि शौक़ पहचनता ही नहीं,,''
मुरादें दहलीज़ ही पे सर रख के मर गई हैं

मैं किस वतन की तलाश में यूँ चला था घर से
कि अपने घर में भी अजनबी हो गया हूँ .. आ कर
(8)
मेरे रौशनदान में बैठा एक कबूतर

मेरे रौशनदार में बैठा एक कबूतर
जब अपनी मादा से गुटरगूँ कहता है
लगता है मेरे बारे में, उसने कोई बात कही।
शायद मेरा यूँ कमरे में आना और मुख़ल होना
उनको नावाजिब लगता है।
उनका घर है रौशनदान में
और मैं एक पड़ोसी हूँ
उनके सामने एक वसी आकाश का आंगन
हम दरवाज़े भेड़ के, इन दरबों में बन्द हो जाते हैं
उनके पर हैं, और परवाज़ ही खसलत है
आठवीं, दसवीं मंज़िल के छज्जों पर वो
बेख़ौफ़ टहलते रहते हैं
हम भारी-भरकम, एक क़दम आगे रक्खा
और नीचे गिर के फौत हुए।

बोले गुटरगूँ…
कितना वज़न लेकर चलते हैं ये इन्सान
कौन सी शै है इसके पास जो इतराता है
ये भी नहीं कि दो गज़ की परवाज़ करें।

आँखें बन्द करता हूँ तो माथे के रौशनदान से अक्सर
मुझको गुटरगूँ की आवाज़ें आती हैं !!

(9)
वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा

वक़्त को आते न जाते न गुजरते देखा
न उतरते हुए देखा कभी इलहाम की सूरत
जमा होते हुए एक जगह मगर देखा है

शायद आया था वो ख़्वाब से दबे पांव ही
और जब आया ख़्यालों को एहसास न था
आँख का रंग तुलु होते हुए देखा जिस दिन
मैंने चूमा था मगर वक़्त को पहचाना न था

चंद तुतलाते हुए बोलों में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी ,चिकनी-सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में पड़ी थी
मुझे एहसास ही नहीं था कि वहां वक़्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था

चूड़ियाँ चढ़ती-उतरती थीं कलाई पे मुसलसल
और हाथों से उतरती कभी चढ़ती थी किताबें
मुझको मालूम नहीं था कि वहां वक़्त लिखा है

वक़्त को आते न जाते न गुज़रते देखा
जमा होते हुए देखा मगर उसको मैंने
इस बरस बोस्की अठारह बरस की होगी
(10)
टुकड़ा ..

छोटा सा शीशे का टुकड़ा
घास के अन्दर छुप के बैठा
मेरी आँख पे सूरज मार के ख़ुश होता है, हँसता है

सूरज ख़ुश है,
छोटा सा शीशे का टुकड़ा
घास में रख के खेल रहा है
मेरी आँख पे छींटे मार के छेड़ रहा है

आँख पे एक हथेली रख के
मैं फ़ौरन दोनों की आँखों से ओझल हो जाता हूँ
उँगलियों की झिर्रियों से वो दोनों झाँक के
मुझको ढूँढने लगते हैं

और मैं आँखें बंद किये
तेरी गोद में सर रख के छुप जाता हूँ!
क़ायनात से आँख मिचोली खेल रहा हूँ!!
(11)

खाली समन्दर ..

उसे फिर लौट के जाना है, ये मालूम था उस वक़्त भी जब शाम की –
सुर्खोसुनहरी रेत पर वह दौड़ती आई थी ....
और लहरा के –
यूं आग़ोश में बिखरी थी ... जैसे पूरे का पूरा समंदर –
ले के उमड़ी है ..!!

उसे जाना है ... वो भी जानती थी,
मगर हर रात फिर भी हाथ रख कर चाँद पर खाते रहे कसमे ,,,
ना मैं उतरूँगा अब …
(12)
देर आयद
आठ ही बिलियन उम्र ज़मीं की होगी शायद
ऐसा ही अंदाज़ा है कुछ ‘साईन्स’ का
चार अशारिया छ: बिलियन सालों की उम्र तो
बीत चुकी है
कितनी देर लगा दी तुम ने आने में
और अब मिल कर
किस दुनिया की दुनियादारी सोच रही हो
किस मज़हब और ज़ात और पात की फ़िक्र लगी है
आओ चलें अब
तीन ही ‘बिलियन’ साल बचे हैं!

(13)
कुछ देर तक......
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो..........
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर

मुझको फ़िक्र है आगाज़ की..... देखो ना सपना अंजाम का..... सदियों की बेताबियाँ खत्म हो.... इक पल मिले जो आराम का............

रहता नहीं संग कोई सदा...जाने वफ़ा है मुझको पता ... दो चार लम्हा रहो तुम रूबरू..... दिल तुमसे कहना यही चाहता ......
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो................
माना जिंदगी है तनहा सफ़र..... इल्तजा यही है जाने जिगर

कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो..........
साथ चलो..........
कुछ देर तक...... कुछ दूर तक.......... तो साथ चलो....

(14)

हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है..
बदलने वाला है मौसम…
नये आवेज़े कानों में लटकते देख कर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई…!
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरू होगा
सभी पत्ते गिरा के गुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़, सब्ज़े पर छपी, पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है!
पहाड़ों से पिघलती बर्फ़ बहती है धुलाने पैर ‘पाइन’ के
हवाएँ झाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती हैं
मगर जब रेंगने लगती है इन्सानों की बस्ती
हरी पगडन्डियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़, अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का, इसे जी लो !
(15)
शाख़ पे बैठी मीना..

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लमहा-लमहा खोल रही है
पत्ता-पत्ता बीन रही है
एक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायन
एक-एक साँस को खोल के, अपने तन
पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की क़ैदी
रेशम की यह शायर इक दिन
अपने ही तागों में घुटकर मर जाएगी।

(16)
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई
आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
पक गया है शज़र पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

(17)
इक हसीं निगाह का मुझ पे साया है ़..
जादू है जूनून है कैसी माया है....ये माया है ...
तेरी नीली आँखों के भंवर बड़े हसीन हैं
डूब जाने दो मुझे ..ये खाव की ज़मीन है
उठा दो अपनी पलकों किओ ये पर्दा क्यूँ गिराया है

(18)
और फिर यूँ हुआ, रात एक ख्वाब ने जगा दिया
और फिर यूँ हुआ, रात एक ख्वाब ने जगा दिया
फिर यूँ हुआ चाँद की वो डली घुल गयी
और यूँ हुआ, ख्वाब की वो लड़ी खुल गयी
चलती रही बेनूरियां, चलते रहे अंधेरों की रौशनी के तले
फिर नहीं सो सके, एक सदी के लिए हम दिलजले
फिर नहीं सो सके, एक सदी के लिए हम दिलजले

और फिर यूँ हुआ, सुबह की धूल ने उड़ा दिया
और फिर यूँ हुआ, सुबह की धूल ने उड़ा दिया
फिर यूँ हुआ, चेहरे के नक्श सब धुल गए
और यूँ हुआ, गर्द थे गर्द में रुल गए
तन्हाईयाँ ओढ़े हुए, गलते रहे भीगे हुए आँसुओं से गले
फिर नहीं सो सके, एक सदी के लिए हम दिलजले
एक सदी के लिए हम दिलज

(19)
वो जो शायर था चुप-सा रहता था
बहकी-बहकी-सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूँगी खामोशियों की आवाज़ें!

जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे-रूखे- से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था

वक़्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब- सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

चाँद से गिर के मर गया है वो
लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है |

(20)

जंग का कूड़ा एक जगह पर जम’अ हुआ है
पहली बार है..
इतने सारे बाज़ू, टाँगे, हाथ और सर और पाँव
ऐसे अलग-अलग बिखरे देखे हैं
बचे खुचे पुरज़े लगते हैं
‘स्पेयर पार्ट्स’ हैं

बाज़ू एक जुलाहे का, हिलता है अब तक
काँप रहा है या शायद कुछ कात रहा है
टांग है एक खिलाड़ी की.. रन आउट हुआ है
घर तक दौड़ते-दौड़ते राह में मारा गया..

सर है एक जो लुढ़क रहा है
टूटे-फूटे शे’र अभी तक सर में खड-खड बजते हैं
नज़्मों के छंद टूट गए हैं
उंगलियाँ रेंग रही हैं कुछ
मिटटी में तारीख़ दर्ज़ करने की कोशिश लगती है..!

पुरज़ा पुरज़ा खोल के एक मैकेनिक ने
उनकी मरम्मत चाही थी…
बुरा लगा था उसको ये पुरज़े आवाजें करते हैं !!


प्रस्तुति - युधिष्ठर पारीक {युध्द राज}





शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

अहमद फ़राज़

वो बात बात पे देता है परिंदों की मिसाल
साफ़ साफ़ नहीं कहता मेरा शहर ही छोड़ दो

तुम्हारी एक निगाह से कतल होते हैं लोग फ़राज़
एक नज़र हम को भी देख लो के तुम बिन ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती

अब उसे रोज़ न सोचूँ तो बदन टूटता है फ़राज़
उमर गुजरी है उस की याद का नशा किये हुए

एक नफरत ही नहीं दुनिया में दर्द का सबब फ़राज़
मोहब्बत भी सकूँ वालों को बड़ी तकलीफ़ देती है

हम अपनी रूह तेरे जिस्म में छोड़ आए फ़राज़
तुझे गले से लगाना तो एक बहाना था

माना कि तुम गुफ़्तगू के फन में माहिर हो फ़राज़
वफ़ा के लफ्ज़ पे अटको तो हमें याद कर लेना

ज़माने के सवालों को मैं हँस के टाल दूँ फ़राज़
लेकिन नमी आखों की कहती है "मुझे तुम याद आते हो"

अपने ही होते हैं जो दिल पे वार करते हैं फ़राज़
वरना गैरों को क्या ख़बर की दिल की जगह कौन सी है

तोड़ दिया तस्बी को इस ख्याल से फ़राज़
क्या गिन गिन के नाम लेना उसका जो बेहिसाब देता है

हम से बिछड़ के उस का तकब्बुर बिखर गया फ़राज़
हर एक से मिल रहा है बड़ी आजज़ी के साथ

उस शख्स से बस इतना सा ताल्लुक़ है फ़राज़
वो परेशां हो तो हमें नींद नहीं आती

अब उसे रोज़ न सोचूँ तो बदन टूटता है फ़राज़
उम्र गुज़री है उसकी याद का नशा करते

बर्बाद करने के और भी रास्ते थे फ़राज़
न जाने उन्हें मुहब्बत का ही ख्याल क्यूं आया

तू भी तो आईने की तरह बेवफ़ा निकला फ़राज़
जो सामने आया उसी का हो गया

बच न सका ख़ुदा भी मुहब्बत के तकाज़ों से फ़राज़
एक महबूब की खातिर सारा जहाँ बना डाला

मैंने आज़ाद किया अपनी वफ़ाओं से तुझे
बेवफ़ाई की सज़ा मुझको सुना दी जाए

मैंने माँगी थी उजाले की फ़क़त इक किरन फ़राज़
तुम से ये किसने कहा आग लगा दी जाए

इतनी सी बात पे दिल की धड़कन रुक गई फ़राज़
एक पल जो तसव्वुर किया तेरे बिना जीने का

इस तरह गौर से मत देख मेरा हाथ ऐ फ़राज़
इन लकीरों में हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं

उसने मुझे छोड़ दिया तो क्या हुआ फ़राज़
मैंने भी तो छोड़ा था सारा ज़माना उसके लिए

ये मुमकिन नहीं की सब लोग ही बदल जाते हैं
कुछ हालात के सांचों में भी ढल जाते हैं

खाली हाथों को कभी गौर से देखा है फ़राज़
किस तरह लोग लकीरों से निकल जाते हैं

वो रोज़ देखता है डूबे हुए सूरज को फ़राज़
काश मैं भी किसी शाम का मंज़र होता

कौन देता है उम्र भर का सहारा फ़राज़
लोग तो जनाज़े में भी कंधे बदलते रहते हैं

मेरी ख़ुशी के लम्हे इस कदर मुख्तसिर हैं फ़राज़
गुज़र जाते हैं मेरे मुस्कराने से पहले

चलता था कभी हाथ मेरा थाम के जिस पर
करता है बहुत याद वो रास्ता उसे कहना

उम्मीद वो रखे न किसी और से फ़राज़
हर शख्स महब्बत नहीं करता उसे कहना

वो बारिश में कोई सहारा ढूँढता है फ़राज़
ऐ बादल आज इतना बरस की मेरी बाँहों को वो सहारा बना ले

गिला करें तो कैसे करें फ़राज़
वो लातालुक़ सही मगर इंतिखाब तो मेरा है

ये वफ़ा उन दिनॉन की बात है फ़राज़
जब लोग सच्चे और मकान कच्चे हुआ करते थे

दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की फ़राज़
लोगों ने मेरे घर से रास्ते बना लिए

कभी टूटा नहीं मेरे दिल से आपकी याद का तिलिस्म फ़राज़
गुफ़्तगू जिससे भी हो ख्याल आपका रहता है

फुर्सत मिले तो कभी हमें भी याद कर लेना फ़राज़
बड़ी पुर रौनक होती हैं यादें हम फकीरों की

दोस्ती अपनी भी असर रखती है फ़राज़
बहुत याद आएँगे ज़रा भूल कर तो देखो

मुहब्बत में मैंने किया कुछ नहीं लुटा दिया फ़राज़
उस को पसंद थी रौशनी और मैंने खुद को जला दिया

उस शख्स से वाबस्ता खुशफ़हमी का ये आलम है फ़राज़
मौत की हिचकी आई तो मैं समझा उसने याद किया

कभी हिम्मत तो कभी हौसले से हार गए
हम बदनसीब थे जो हर किसी से हार गए
अजब खेल का मैदान है ये दुनिया फ़राज़
कि जिसको जीत चुके उसी से हार गए

चाहने वाले मुक़द्दर से मिला करते हैं फ़राज़
उस ने इस बात को तस्लीम किया मेरे जाने के बाद

वो बाज़ाहिर तो मिला था एक लम्हे को फ़राज़
उम्र सारी चाहिए उसको भुलाने के लिए

वक़्त-ए-नज़ा है, इस कशमकश में हूँ की जान किसको दूं फ़राज़
वो भी आए बैठे हैं और मौत भी आई बैठी है

एक पल जो तुझे भूलने का सोचता हूँ फ़राज़
मेरी साँसें मेरी तकदीर से उलझ जाती हैं

सवाब समझ कर वो दिल के टुकड़े करता है फ़राज़
गुनाह समझ कर हम उन से गिला नहीं करते

मोहब्बत के अंदाज़ जुदा होते हैं फ़राज़
किसी ने टूट के चाहा और कोई चाह के टूट गया

मौसम का ऐतबार ज्यादा नहीं किया सो उसने हमसे प्यार ज्यादा नहीं किया
कुछ तो फ़राज़ हमने पलटने में देर की कुछ उसने इंतज़ार ज्यादा नहीं किया

मैं डूब के उभरा तो बस इतना ही देखा है फ़राज़
औरों की तरह तू भी किनारे पे खड़ा था

वो ये समझता है की मैं हर चेहरे का तलबगार हूँ फ़राज़
मैं देखता सभी को हूँ बस उसी तलाश में हूँ

आँखों में हया हो तो पर्दा दिल का ही काफी है फ़राज़
नहीं तो नकाबों से भी होते हैं इशारे मोहब्बत के

ये सोचा कर तेरी महफ़िल में चला आया हूँ फ़राज़
तेरी सोहबत में रहूँगा तो संवर जाऊंगा

ये ही सोच कर उस की हर बात को सच माना है फ़राज़
के इतने खूबसूरत लब झूठ कैसे बोलते होंगे

मेरे लफ़्ज़ों की पहचान अगर कर लेता वो फ़राज़
उसे मुझ से नहीं खुद से मुहब्बत हो जाती

उस की निगाह में इतना असर था फ़राज़
खरीद ली उसने एक नज़र में ज़िन्दगी हमारी

जब उसका दर्द मेरे साथ वफ़ा करता है
एक समुन्दर मेरी आँखों से बहा करता है

उसकी बातें मुझे खुशबू की तरह लगती हैं
फूल जैसे कोई सेहरा में खिला करता है

मेरे दोस्त की पहचान यही काफी है
वो हर शख्स को दानिस्ता खफा करता है

जब खिज़ां आए तो लौट आएगा वो भी फ़राज़
वो बहारों में ज़रा कम ही मिला करता है फ़राज़

अक्ल वालों के मुक़द्दर ये ज़ोक-ए-जुनूं कहाँ फ़राज़
ये इश्क वाले हैं जो हर चीज़ लुटा देते हैं

वो बेवफा न था यूँ ही बदनाम हो गया फ़राज़
हजारों चाहने वाले थे वो किस किस से वफ़ा करते

फिर इतने मायूस क्यूँ हो उसकी बेवफाई पर फ़राज़
तुम खुद ही तो कहते थे की वो सब से जुदा है

रूठ जाने की अदा हम को भी आती है फ़राज़
काश होता कोई हम को भी मनाने वाला

वो जानता था उसकी मुस्कुराहट मुझे पसंद है फ़राज़
उसने जब भी दर्द दिया मुस्कुराते हुए दिया

किस किस से मुहब्बत के वादे किये हैं तू ने फ़राज़
हर रोज़ एक नया शख्स तेरा नाम पूछता है

किताबों से दलीलें दूं या खुद को सामने रख दूं फ़राज़
वो मुझ से पूछ बैठी हैं मुहब्बत किसको कहते हैं

तुम मुझे मौक़ा तो दो ऐतबार बनाने का फ़राज़
थक जाओगे मेरी वफ़ा के साथ चलते चलते

वफ़ा की लाज में उसको मना लेते तो अच्छा था फ़राज़
अना की जंग में अक्सर जुदाई जीत जाती है

कांच की तरह होते हैं गरीबों के दिल फ़राज़
कभी टूट जाते हैं तो कभी तोड़ दिए जाते हैं

नाकाम थीं मेरी सब कोशिशें उस को मनाने की फ़राज़
पता नहीं कहाँ से सीखीं जालिम ने अदाएं रूठ जाने की

उस से बिछड़े तो मालूम हुआ की मौत भी कोई चीज़ है फ़राज़
ज़िन्दगी वो थी जो हम उसकी महफ़िल में गुज़ार आए

उम्मीद-ए-वफ़ा ना रख उन लोगों से फ़राज़
जो मिलते हैं किसी से होते हैं किसी के

हम ने सुना था की दोस्त वफ़ा करते हैं फ़राज़
जब हम ने किया भरोसा तो रिवायत ही बदल गई

बर्बाद होने के और भी रास्ते थे फ़राज़
न जाने हमें मुहब्बत का ही ख्याल क्यूँ आया

बस यही आदत उसकी मुझे अच्छी लगती है फ़राज़
उदास कर के मुझे भी वो खुश नहीं रहता

हजूम ए दोस्तों से जब कभी फुर्सत मिले
अगर समझो मुनासिब तो हमें भी याद कर लेना

हमारे बाद नहीं आएगा तुम्हे चाहत का ऐसा मज़ा फ़राज़
तुम लोगों से खुद कहते फिरोगे की मुझे चाहो तो उसकी तरह

इस तरह गौर से मत देख मेरा हाथ फ़राज़
इन लकीरों में हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं

इतना न याद आया करो कि रात भर सो न सकें फ़राज़
सुबह को सुर्ख आखों का सबब पूछते हैं लोग


कभी कभी तो रो पड़ती हैं यूँ ही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता

मैं अपने दिल को ये बात कैसे समझाऊँ फ़राज़
कि किसी को चाहने से कोई अपना नहीं होता

कितना खौफ़ होता है शाम के अंधेरों में फ़राज़
पूछ उन परिंदों से जिन के घर नहीं होते

मैं वफ़ा का कौन सा सलीका इख्तियार करूं फ़राज़
उसे यकीन हो जाए के मुझे वो हर एक से प्यारा है

महफ़िल से उठ के जाना तो कोई बात नहीं थी फ़राज़
मेरा मुड़ मुड़ के देखना उसे बदनाम कर गया

मुझको मालूम नहीं हुस्न की तारीफ फ़राज़
मेरी नज़रों में हसीन वो है जो तुझ जैसा हो

कसूर नहीं इसमें कुछ भी उनका फ़राज़
हमारी चाहत ही इतनी थी की उन्हें गुरूर आ गया

समंदर में फ़ना होना तो किस्मत की कहानी है फ़राज़
जो मरते हैं किनारों पे मुझे दुःख उन पे होता हैं

तपती रही है आस की किरणों पे ज़िन्दगी
लम्हे जुदाइयों के मा - ओ साल हो गए

जो कभी हर रोज़ मिला करते थे फ़राज़
वो चेहरे तो अब ख़ाब ओ ख़याल हो गए

तू किसी और के लिए होगा समन्दर ए इश्क़ फ़राज़
हम तो रोज़ तेरे साहिल से प्यासे गुज़र जाते हैं

उसे तेरी इबादतों पे यकीन है नहीं फ़राज़
जिस की ख़ुशियां तू रब से रो रो के मांगता है

उसकी जफ़ाओं ने मुझे एक तहज़ीब सिख दी है फ़राज़
मैं रोते हुए सो जाता हूँ पर शिकवा नहीं करता

उस शख्स से वाबस्ता खुशफहमी का ये आलम है फ़राज़
मौत की हिचकी आई तो मैं समझा कि उसने याद किया

वफ़ा की आज भी क़दर वही है फ़राज़
फकत मिट चुके हैं टूट के चाहने वाले

ये कह कर मुझे मेरे दुश्मन हँसता छोड़ गए
तेरे दोस्त काफी हैं तुझे रुलाने के लिए

ये ज़लज़ले यूँ ही बेसबब नहीं आते
ज़रूर ज़मीन के नीचे कोई दीवाना तड़पता होगा

प्रस्तुति- युधिष्टर पारीक

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

सफल होगी तेरी अराधना....सचिन देव बर्मन

सचिन देव बर्मन, जिन्हें बर्मन दा के नाम से ज्यादा याद किया जाता है, शुरुआती दौर के रिकार्डस पर नाम दर्ज है- कुमार सचिन देव बर्मन। त्रिपुरा में 1अक्टूबर 1906 को त्रिपुरा के राजघराने में सचिन दा जन्म हुआ था। उनकी जन्मस्थली कोमिला ( अगरतला) जो अब बांग्लादेश में चली गई है। के राजा ईशानचन्द्र देव बर्मन के पोते और नवद्वीप चंद्र देव बर्मन के बेटे थे। इस नाते वे इस राजघराने के कुमार थे। पिता को राज- काज से ज्यादा संगीत से इश्क़ था। वे ध्रपद शैली के गायक थे और चार बहनों में सबसे छोटे सचिन ने पिता की राह पकड़ी।
कलकत्ता में बर्मन दादा ने प्रसिद्ध गायक केसीडे, भीष्मदेव चट्टोपाध्याय, उस्ताद अल्लाउद्दीन खान साहब, उस्ताद आफताबउद्दीन ,उस्ताद बादल खान की शागिर्दी की और उनसे संगीत की शिक्षा ली। फिर उस्ताद आफताबउद्दीन से गंड़ा बँधवाया । दादा की महत्वकांक्षा उस दौर के तमाम बड़े संगीतकार की तरह न्यू थियेटर्स का संगीतकार बनने की थी लेकिन वहां तो पहले ही आरसी बोराल और पंकज मलिक मौजूद थे।
पंकज मलिक ने 1933 में सचिन देव बर्मन को पहली बार मौक़ा दिया। फिल्म थी 'यहूदी की लड़की' कुन्दनलाल सहगल और रतनबाई की मुख्य भुमिकाओ वाली इस फिल्म में उन्हें एक भूमिका भी करनी थी लेकिन गीत रिकाॅर्ड होने के बाद कट कर दिया गया । इनकी जगह पहाड़ी सान्याल को भुमिका मिली और  सचिन देव बर्मन वाले गीत भी उनकी आवाज़ में किये गये।
 सचिन देव बर्मन 1937 में पहली बार वे बंगाल फिल्मों के संगीतकार बन गये । 1941 में मोहन पिक्चर, बम्बई की फिल्म 'ताजमहल' के लिये पहला हिन्दी गीत प्रेम की प्यारी निशानी जाग रही, गाया। इस फिल्म के संगीतकार थे माधुलाल डी मास्टर। 1944 में जब बंबई में बांबे टाकीज से अलग होकर शशधर मुखर्जी के नेतृत्व में फ़िल्मिस्तान नाम की नई कम्पनी बनी तो मुखर्जी ने  सचिन देव बर्मन को बंबई आने का न्योता दिया ।  सचिन देव बर्मन की बतौर संगीतकार पहली फिल्म थी, 'शिकारी' और दुसरी फिल्म थी, 'अाठ दिन' 1946 में इन दो फिल्मों के बाद 1947 में रिलीज़ फिल्म - दो भाई के दो गीत 'मेरा सुन्दर सपना बीत गया' और दुसरा गाना 'याद करोगे, इक दिन हमको' । ने गीता राय जो बाद में गीता दत के नाम से विख्यात हुई, बेमिसाल प्रसिध्दि मिली।
 1949 की फिल्म 'शबनम' जिसमें दिलीप कुमार के साथ नायिका कामिनी कौशल। इस फिल्म में एक बहुभाषी गीत था, जिसे शमशाद बेगम ने गाया था। गीत के बोल थे ' ये दुनिया रुप की चोर , बचा ले बाबू' ये गीत बहुत हिट हुआ। इसके बाद 1951 में आई बाजी - तदबीर से बिगड़ी  हुई तक़दीर बना ले, 'सुनो ग़जर क्या गाए', आज कि रात पिया दिल न तोड़ो, मन की बात पिया मान लो'। इसी साल  रिलीज़ हुई दादा की छ: फ़िल्मों में सबसे ज्यादा हिट गीतों वाली 'सज़ा'- तुम न जाने किस जहां में खो गए/ हम भरी दुनीया में तन्हा हो गए'- आ गुप -चुप,- गुप- चिप प्यार करें' और मस्ती भरा गीत ' धक-धक-धक, जिया करें धक/ अंखियों में अंखियां डाल के न तक'।
दादा के संगीत में हरदम जवाँ रंग का एक कारण आर. डी. बर्मन जैसे योगे और प्रतिभावान बेटे का साथ होना भी था, जो उनके बतौर असिस्टेंट काम रहे थे। लेकिन दादा अपने संगीत को लेकर अपने सारे फ़ैसले ख़ुद ही लेते थे। 1967 की फिल्म 'ज्वेल थीप का 'रात अकेली है'वाला गीत ही ले लें, इतना रंगीन और जवान गीत है कि इसकी कल्पना करना थोड़ कठीन है कि धोती - कुर्ता पहनने वाला 61 के बूढ़ा आदमी ने इस गाने को रचा होगा।
दादा के चरित्र जहां एक तरफ बला की सादगी और संगीत के लिए समर्पण का भाव था, वही उनमें एक बाल सुलभ सहजता और चंचलता का भी मिश्रण था। एक तरह राजसी नफ़ासत और ठसक थी तो वहीं दूसरी तरफ भावनाओं की कोमलता भी थी।
जीवन के अन्तिम समय में बर्मन दा ने ऋषिकेश मुखर्जी कि फिल्म अभिमान, चुपके, चुपके और मिली उनके आखिरी दौर की फिल्में थीं। बर्मन दा 69 वर्ष की अवस्था में 31 अक्तूबर 1975 को अन्तिम सांस ली। हिन्दी सिनेमा जगत
में आज भी बर्मन दा योगदान को याद करता है।

                                                                               
                                                                                                                                      युधिष्ठिर राज पारीक